चंडीगढ़/रोहतक/अंबाला
हरियाणा वन विभाग इन दिनों अपनी ही अजब-गजब कार्यशैली की वजह से सुर्खियों में है। विभाग के भीतर एक ऐसा विरोधाभास चल रहा है, जिसे देखकर कोई भी हैरान रह जाए। विभाग में कंजरवेटर नार्थ सर्कल व सैंट्रल सर्कल यानी अंबाला व रोहतक का पद लंबे समय से खाली है एक सर्कल में पांच जिले है वहां पर किसी को चार्ज नहीं दिया जा रहा न ही किसी को स्थाई तौर पर लगाया जा रहा है, जबकि एक गार्ड की पोस्ट जो वन विभाग में सबसे नीचे की पोस्ट है वहां पर एक-एक गार्ड को दो से तीन जिलों में केवल कार्य को सुचारु रुप से चलाने के नाम पर चार्ज दिया जा रहा है। यानी गार्ड-दरोगा के पद खाली न रहे उसकी चिंता है जबकि कंजरवेटर के पद खाली पड़े है उसकी चिंता किसी को नहीं है।
10 जिलों वाले दो बड़े सर्कल ‘अनाथ’, कंजरवेटर का पद खाली
अब असली खेल देखिए! विभाग के दो बेहद महत्वपूर्ण हिस्से—सेंट्रल सर्किल (रोहतक) और नॉर्थ सर्किल (अंबाला)—इन दोनों में ‘कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स’ (वन संरक्षक) के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। इन दोनों के अंडर करीब 10 जिले आते हैं। यानी 10 जिलों का पूरा का पूरा एरिया बिना मुखिया के भगवान भरोसे चल रहा है।
हैरानी की बात यह है कि विभाग इन खाली पदों पर न तो किसी की पक्की नियुक्ति कर रहा है और न ही किसी अधिकारी को इनका अतिरिक्त चार्ज (Additional Charge) देने की जहमत उठा रहा है।
बड़े पदों पर खुली छूट, लेकिन सर्किलों में अलग नियम क्यों?
विभाग के इन दोहरे मापदंडों पर बड़े सवाल उठ रहे हैं:
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एक तरफ तो एक ही अधिकारी को अतिरिक्त एमडी, सीसीएफ मुख्यालय, वन सचिव और पर्यावरण सचिव जैसे चार-चार बड़े और ताकतवर पद एक साथ सौंपे जा सकते हैं।
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लेकिन जब बात रोहतक और अंबाला जैसे 10 जिलों वाले दो बड़े सर्किलों की आती है, तो कंजरवेटर का चार्ज देने से विभाग के हाथ-पैर क्यों कांपने लगते हैं?
आखिर इन दोनों जगहों के लिए विभाग की नीति इतनी अलग क्यों है? क्या बड़े अधिकारियों के लिए नियम अलग और आम व्यवस्था के लिए नियम अलग हैं?




