यमुनानगर/दादूपुर हेड : दादूपुर हेड पर पश्चिमी यमुना नहर के बीचों-बीच बने पार्क की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह नहर के तेज बहाव के बीच कंक्रीट की परतें उखड़ रही हैं और पार्क का किनारा धंसकर पानी में समा रहा है। महज कुछ महीने पहले मरम्मत करने के बावजूद पार्क के दक्षिणी हिस्से का किनारा एक बार फिर कटाव की भेंट चढ़ गया है। चिंता की बात यह है कि इस पार्क में आसपास के गांवों के साथ-साथ शहर से भी लोग अपने बच्चों के साथ घूमने और समय बिताने आते हैं। ऐसे में नहर के बीच बने पार्क का किनारा टूटना किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। खास बात यह है कि टूटे हुए हिस्से के ठीक सामने सिंचाई विभाग के (एक्सईएन) का सरकारी आवास स्थित है, इसके बावजूद किनारे की बदहाल स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। केवल एक्सईएन का आवास ही नहीं, बल्कि एसडीओ का कार्यालय भी हेड पर मौजूद है ऐसे में सब कुछ हो रहा है।

 उधड़ गई मरम्मत की पोल

स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दादूपुर हेड स्थित पार्क साइड के किनारों की मरम्मत का कार्य कुछ ही महीने पहले पूरा हुआ था। उस समय मजबूत निर्माण का दावा किया गया था, लेकिन थोड़े से तेज बहाव ने ही इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्क के दक्षिणी हिस्से का किनारा दरककर नीचे पानी की ओर लटक गया है। लगातार बढ़ते कटाव से न केवल पार्क की संरचना को नुकसान पहुंचने का खतरा है, बल्कि यहां आने वाले लोगों की सुरक्षा भी दांव पर लगी हुई है।

बच्चों के साथ घूमने आने वाले लोगों की सुरक्षा पर खतरा

दादूपुर हेड का यह पार्क आसपास के गांवों और शहर के लोगों के लिए घूमने-फिरने की जगह है। छुट्टियों और शाम के समय यहां परिवार अपने बच्चों के साथ पहुंचते हैं। ऐसे में पार्क के किनारे का टूटना महज निर्माण कार्य की खराब गुणवत्ता का मामला नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर मुद्दा है। यदि समय रहते क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत नहीं कराई गई और लोगों को खतरे से आगाह करने के लिए उचित इंतजाम नहीं किए गए, तो कभी भी कोई अप्रिय घटना हो सकती है।

अधिकारियों के आवास के सामने बदहाली का आलम

लापरवाही पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि जिस क्षतिग्रस्त किनारे के ठीक सामने विभाग के एक्सईएन का सरकारी आवास है, वही हिस्सा जर्जर हालत में पहुंच गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ समय पहले दूसरी साइड का किनारा टूटने पर मिट्टी से भरे कट्टे लगाकर अस्थायी इंतजाम किया गया था। लेकिन यह व्यवस्था भी नहर के तेज बहाव को रोकने में नाकाम रही और कट्टे बहते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अधिकारियों के आवास के सामने ही सुरक्षा व्यवस्था का यह हाल है, तो अन्य स्थानों पर नहर के किनारों की निगरानी और रखरखाव किस तरह किया जा रहा होगा।

निर्माण कार्य और सरकारी बजट के इस्तेमाल पर सवाल

इस घटना ने सिंचाई विभाग की कार्यप्रणाली और रखरखाव के नाम पर खर्च होने वाले सरकारी बजट की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मरम्मत का काम गुणवत्ता के साथ किया गया था, कुछ महीने के भीतर ही किनारा दोबारा कैसे टूट गया? क्या निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच की गई थी और क्या किसी की जिम्मेदारी तय की गई? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है। फिलहाल क्षतिग्रस्त हिस्से की स्थिति निर्माण कार्य की गुणवत्ता और निगरानी की समीक्षा किए जाने की जरूरत को उजागर करती है।

निष्पक्ष जांच और स्थायी समाधान की मांग

ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने संबंधित उच्चाधिकारियों से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और मरम्मत कार्य में इस्तेमाल सामग्री तथा निर्माण की गुणवत्ता की जांच की जाए। साथ ही, पार्क के क्षतिग्रस्त किनारे पर तत्काल सुरक्षा इंतजाम कराकर मजबूत और स्थायी समाधान किया जाए, ताकि नहर के बीच स्थित पार्क में घूमने आने वाले लोगों और उनके बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। लोगों का कहना है कि सरकारी धन खर्च करने के बाद भी यदि निर्माण कुछ महीनों में ही टूटने लगे, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

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