146 मामलों को कोर्ट भेजने के बजाय विभागीय स्तर पर ‘कंपाउंड’ करने वाले तत्कालीन DFO जांच से बाहर क्यों?

कलेसर, यमुनानगर: हरियाणा के कलेसर वन्यजीव अभयारण्य (WLS) और नेशनल पार्क में खैर के पेड़ों की अवैध कटाई और वन्यजीव शरणस्थली को नष्ट करने को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है। उसमें 13209 एकड़ जंगल में अवैध कटान की जांच की गई, जिसमें खैर के 3253 पेड़ों कटान का पता चलने पर केवल कलेसर वाइल्ड लाइफ इंस्पेक्टर को बलि का बकरा बना दिया गया है, जबकि विभाग को सौंपी गई रिपोर्ट में  जांच के दौरान के पाई गई कुल 3253 मुंडियों में से पुरानी मुंडिया 1780 जबकि नई मुंडिया 1473 पाई गई, वहीं रिपोर्ट में यह स्पष्ट रुप से बताया गया कि जिनको नई मुंडिया बताया गया है वह भी दो साल पुरानी हो सकती है, जबकि वाइल्ड लाइफ के पास चार्ज  सिंतबर 2025 में आया था, यानी लगभग छह या सात माह पूर्व। इससे पूर्व यह पूरा एरिया टेरिटोरियल के पास ही था। 

3,200 से अधिक पेड़ काटे गए

समिति द्वारा सौंपे गए आंकड़ों के अनुसार, पूरे क्षेत्र में खैर के पेड़ों के कुल 3,253 ठूंठ (Stumps) पाए गए हैं। पुराने ठूंठ या मुंडिया 1780 जबकि नई मुंडिया 1473 पाई गई, यानी कटान बहुत लंबे समय से चल रहा था। इसका रिपोर्ट में जिक्र भी किया गया है। 

 रिपोर्ट के अनुसार फील्ड विजिट के मुख्य अवलोकन और तथ्य

पुराने ठूंठ: रिपोर्ट में दर्ज पुराने ठूंठों की उम्र या कटाई की अवधि को ध्यान में नहीं रखा गया है इसमें 10 साल से भी अधिक पुराने और गले हुए ठूंठ भी शामिल किए गए हैं

नए ठूंठ: रिपोर्ट किए गए नए ठूंठ भी 2 साल तक पुराने हो सकते हैं  जांच में कुछ ठूंठों पर कुल्हाड़ी मारकर देखा गया, तो उनमें ‘सैपवुड’ (गीली लकड़ी) नहीं पाई गई

कटाई का समय: यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि जो नए ठूंठ मिले हैं, वे क्षेत्र को वन्यजीव विंग (Wildlife Wing) को सौंपे जाने के बाद के ही हैं

सबूत मिटाने की कोशिश: फील्ड चेकिंग के दौरान, कांसली और चिकन बीट में पेड़ों के ठूंठों को जमीन खोदकर निकालने के मामले भी पाए गए हालांकि, उनकी जड़ों की जांच करने पर वे पुरानी और सूखी पाई गईं

रिपोर्ट में कटान को बताया पुरानी समस्या: कलेसर अभयारण्य और आसपास के क्षेत्रों में खैर की अवैध कटाई एक बहुत पुरानी समस्या है और समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं वन विभाग ने लकड़ी तस्करों के खिलाफ नियमित कार्रवाई भी की है

यानी इस रिपोर्ट से निष्कर्ष  निकाला जाए तो यह कहीं से नहीं लगता कि इस मामले में मौजूदा वाइल्ड लाइफ स्टाफ की कोई लापरवाही या कमी रही हो, इसके बावजूद कलेसर के वाइल्ड लाइफ इंस्पेक्टर को सस्पेंड कर दिया गया, जबकि नियमानुसार अगर कहीं लापरवाही सामने आती है तो उसमे पहले डयूटी बीट इंचार्ज गार्ड या उससे ऊपर सब इंस्पेक्टर की होती है उसके बाद इस्पेक्टर की जिम्मेदारी आती है। 

इस मामले में जो सबसे बड़ा सवाल है कि रिपोर्ट के अनुसार जब दस साल पुरानी मुंडियां तक गिनी गई,  ऐसा भी कहा गया कि नई मुंडियां भी दो साल से पुरानी हो सकती है ऐसे में जिस भी टेरिटोरियल के स्टाफ के पास संबधित एरिया का चार्ज रहा, उसमें से तो किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई, यानी यह कार्रवाई पूरी तरह से एकतरफा कही जा सकती है। 

एक ओर जो सबसे बड़ा सवाल है कि सेंचुरी व नेशनल पार्क का जब यह पूरा एरिया टेरिटोरियल के पास रहा, उस समय नेशनल पार्क व सेंचुरी एरिया जैसे सेंसटिव एरिया में कुल 146 केस कंपाऊंड किए गए या जो अंडर प्राेसेस है। कलेसर रेंज के अंतर्गत कुल 85 मामले कंपाऊंड किए गए जबकि छछरौली रेंज के अंतर्गत 61 मामले कंपाऊंड किए गए। केस कंपाऊंड करना है या उसे कोर्ट में लगाना है उसकी पावर डीएफओ के पास होती है। ऐसे में जवाबदेही तत्कालीन डीएफओ की भी बनती है कि जिनके समय में इतने मामले कंपाऊंड किए गए। यानी सवाल यह है कि आखिर इन केसों को कोर्ट में क्यों नहीं लगाया ओर इन केसों को अवैध कटान की जांच करने आई टीम ने जांच के दायरे से बाहर क्यों रखा । 

जब से सेंचुरी एरिया या नेशनल पार्क एरिया को वाइल्ड लाइफ को सौंपा गया, तब से लगातार वाइल्ड लाइफ विंग स्टाफ की मांग करता रहा, मगर जानबूझकर पूरा स्टाफ नहीं दिया गया। जब अवैध कटान की जांच हो गई तब जाकर वाइल्ड लाइफ विंग को स्टाफ इंस्पेक्टर, सब इंस्पेक्टर उपलब्ध कराए गए, यानी जब सांप निकल गया तब लकीर को पीटे जाने का काम किया गया। 

कलेसर में अवैध कटान की जांच आसरेवाली पीएफ की अवैध कटान की जांच रिपोर्ट आने व उसके बाद लगातार अधिकारियों पर कार्रवाई के बाद शुरु हुई। इस मामले में पहले पीसीसीएफ व चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन को सरकार ने हटा दिया। पहली बार किसी मामले में शायद इतनी सख्त कार्रवाई की गई। इसके साथ ही डीडब्लयूएलओ के अलावा पंचकूला के वाइल्ड इसंपेक्टर को सस्पेंड किया गया। उसी दौरान विभाग ने तत्कालीन पिंजौर-मोरनी के डीएफओ व पंचकूला के रेंज अधिकारी को सस्पेंड किया। इसके साथ ही एक आसरेवाली का चार्ज लिए वन दरोगा रघविंद्र सिंह की संलिप्ता पाए जाने पर विभाग ने उसे सस्पेंड किया पुलिस जांच के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

बाद में वन विभाग ने पिंजौर-मोरनी के तत्कालीन डीएफओ व पंचकूला के रेंज अधिकारी को बहाल कर दिया, मगर वाइल्ड लाइफ विंग से डीडब्लयूएलओ व पंचकूला के इंस्पेक्टर को बहाल नहीं किया गया। जबकि डीडब्लयूएलओ राजेंद्र डांगी ने खुद इसकी जांच के लिए शिकायत पुलिस को दी थी, हालांकि रघुविंद्र सिंह की शिकायत के आधार पर यह मामला दर्ज किया गया, जिसमें राजेंद्र डांगी के बयान दर्ज किए गए।

आसरेवाली के की जांच के पश्चात कलेसर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी एरिया की जांच टीम बनाई गई, जिसकी रिपोर्ट के बाद कलेसर के वन्य जीव निरीक्षक लीलू राम को सस्पेंड किया गया। इस सस्पेंशन के बाद विभागीय कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गए हैं कि रिपोर्ट कुछ कह रही है कार्रवाई कुछ हो रही है।

इस संबंध में निलंबित डीडब्लयूएलओ राजेंद्र डांगी से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वंय पुलिस को शिकायत देकर जांच की मांग की था। इतने लंबे समय की जांच मे पुलिस ने 15 से अधिक आरोपी बनाए, जिसमें अधिकतर को गिरफ्तार कर लिया गया। वह कहीं भी पुलिस जांच में आरोपी के तौर पर नहीं है। ऐसे में उन्होंने सारे तथ्य विभाग के समक्ष रखे हैं। उनको व उनके इंस्पेक्टर्स को जानबूझकर इस मामले में घसीटा जा रहा है, जबकि उन्होंने स्वयं पुलिस जांच की पहल की है।

उन्होंने कहा कि वाइल्ड लाइफ विंग के पास सेंचुरी एरिया व नेशनल पार्क का एरिया आने के बाद कोई केस कंपाऊंड नहीं किया गया, जो भी अवैध कटान के मामले सामने आए उस पर कार्रवाई की गई, जबकि उससे पहले सैकड़ों केस कंपाऊंड किए गए, इन केसों को जांच में शामिल नहीं किया गया। अगर इस तरह की लापरवाही पहले न की जाती तो अवैध कटान की समस्या शायद सामने न आती। उन्होंने बताया कि वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 के तहत नोटिफाइड सेंचुरी एरिया व नेशनल एरिया में इस तरह के गंभीर मामलों को कंपाऊंड करने की पावर किसी अधिकारी के पास नहीं है, इसके बावजूद ऐसा किया गया। 

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