चंडीगढ़: हरियाणा के पर्यावरण, वन एवं वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट में संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) की प्रशासनिक व्यवस्था और शक्तियों के हस्तांतरण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। आखिर 7 अगस्त 2025 का निणर्य किस आधार पर लिया गया ओर अब उसे वापस लेने का कारण क्या रहा । देश की सर्वोच्च् अदालत के एक फैसले में यह स्पष्ट कहा गया है कि चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ही वह प्राधिकारी (Authority) है जो सभी अभ्यारण्यों (Sanctuaries) को नियंत्रित, प्रबंधित और संरक्षित करेगा, मगर 13 अक्टूबर 2026 को जारी एक अन्य आदेश (क्रमांक: 2987-Ft-4-2026/5512) इस पूरे एरिया की कमान पहले की तरह टेरिटोरियल विंग के पास चली जाएगी। सवाल यह नहीं है कि आखिर किसके पास कमान है सवाल यह है कि 7 अगस्त 2025 के निर्णय से पहले की व्यवस्था में क्या सब सही था। वनों में अवैध कटान से लेकर अन्य तमाम विषय तो वैसे ही खड़े है।
1. पहला आदेश: जब वाइल्ड लाइफ विंग को सौंपी गई थीं संरक्षित क्षेत्रों की कमान
हरियाणा सरकार के पर्यावरण, वन एवं वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट द्वारा 7 अगस्त 2025 को जारी एक आदेश (क्रमांक: 1242-Ft-4-2025/4075) में यह स्पष्ट किया गया था कि संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) के भीतर तमाम पौधारोपण (Plantation) और मृदा एवं नमी संरक्षण (Soil & Moisture Conservation) के काम वाइल्ड लाइफ विंग की कड़ी निगरानी और देखरेख में खुद किए जाएंगे।
इस आदेश के तहत उन ब्लॉक और बीट्स के स्टाफ को भी वाइल्ड लाइफ विंग के प्रशासनिक नियंत्रण में ट्रांसफर करने का प्रावधान किया गया था, जो पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्रों के कार्यों को संभालते हैं। इतना ही नहीं, संरक्षित क्षेत्रों में नए कार्यों या मौजूदा कार्यों के रखरखाव के लिए मिलने वाला बजट भी वाइल्ड लाइफ विंग को ट्रांसफर किए जाने का निर्देश दिया गया था। इस कदम को वन्यजीव क्षेत्रों के स्वतंत्र और प्रभावी प्रबंधन की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था।
2. दूसरा आदेश: महज कुछ महीनों में पुराना प्रशासनिक ढांचा बहाल और आदेश वापस
इसके ठीक विपरीत, 13 अक्टूबर 2026 को जारी एक अन्य आदेश (क्रमांक: 2987-Ft-4-2026/5512) के माध्यम से इस पिछले फैसले को पलट दिया। अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा जारी इस नए आदेश में यह हवाला दिया गया कि सरकार ने 7 अगस्त 2025 कोTerritorial Wing से Wildlife Wing में ब्लॉक/बीट्स और स्टाफ के ट्रांसफर से जुड़े आदेशों पर पुनर्विचार किया है और उन्हें वापस ले लिया गया है। इस आदेश के तहत Territorial Wing की पुरानी प्रबंधन व्यवस्था (Previous Management System) को दोबारा बहाल कर दिया गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब एक बार संरक्षित क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन, वन्यजीवों की सुरक्षा और पारदर्शी नियंत्रण के लिए पावर्स वाइल्ड लाइफ विंग को सौंप दी गई थीं, तो इस निर्णय को वापस लेने से आखिर क्या विशेष सुधार हो पाएगा।
अवैध कटान, प्लांटेशन से लेकर एसएमसी कार्यों पर लगातार उठते रहे हैं सवाल
पंचकूला, यमुनानगर व कुरुक्षेत्र-कैथल का कुछ एरिया पूरी तरह से सघन वन क्षेत्र है विभाग प्लांटेशन से लेकर एक अन्य कार्याें के लिए बजट का बड़ा हिस्सा भी यही खर्च करता है। पिछले दस वर्षों में कितनी प्लांटेशन हुई कितनी सक्सेस रेट थी, कितनी प्लांटेशन बची हुई है या जो अन्य कार्य करवाए गए उनका वर्तमान स्टेटस क्या है क्या इस पर कोई सर्वे हुआ है। पिछले एक दो दशक में कितनी भयंकर खैर का अवैध कटान हुआ उसको कैसे रोका जाए, या दोबारा से टेरिटोरियल विंग के पास आने से आगे कटान कैसे रुक पाएगा उस पर कोई विजन है या बस केवल बजट कौन खर्च करेगा, यह ही मुख्य एजेंडा है।
कमजोर वन कानून का हवाला देकर जो स्टाफ आज तक कटान पर रोक नहीं लगा पाया उन कानूनों को मजबूत करने पर क्या विचार हुआ है या जो स्टाफ पिछले 5 से 10 सालों से इस हरे भरे सघन क्षेत्र में डयूटी दे रहा है, उनकी जवाबदेही तय करने के लिए क्या नई योजना है। अगर ऐसा नहीं है तो आखिर इससे क्या फर्क पडता है कि यह क्षेत्र किसके पास रहेगा।
टेरिटोरियल एरिया की चेकिंग रिपोर्ट पर आखिर क्या हुआ
अगस्त 2025 में जब यह एरिया वाइल्ड लाइफ विंग को सौंपा गया तब उसके बाद से खैर के अवैध कटान को लेकर एक कमेटी वाइलड लाइफ एरिया की जांच के लिए बनाई गई, वहीं एक कमेटी टोरिटोरियल के पास जो एरिया है उसकी जांच के लिए बनाई गई। वाइल्ड लाइफ एरिया की जांच रिपोर्ट तो सार्वजनिक कर दी गई, मगर आज तक टेरिटोरियल एरिया में कितना अवैध कटान हुआ, उसकी जांच की रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं है, उस रिपोर्ट में आखिर क्या निकला वहां किसकी जवाबदेही तय की गई यह आज तक सवाल बना हुआ है। इसके साथ ही कलेसर वाइल्ड लाइफ की जांच रिपोर्ट यह स्पष्ट किया गया था कि जो कटान हुआ उसमें से अधिकतर कटान पुराना है यानी वाइल्ड लाइफ विंग को सौपे जाने से पहले का, इसी तरह पंचकूला में भी एक अन्य रिपोर्ट या वन विभाग के दस्तावेज में यह साबित हुआ है कि रिपोर्ट के अनुसार कुल काटे गए पेड़ों से काफी संख्या में पेड़ एरिया सौपे जाने से पहले कटे थे, जिसकी जांच बकायदा टेरिटोरियल विंग ने करवाई थी, मगर कार्रवाई कुछ नहीं हुई थी।
3. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय और ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ का संदर्भ
इस पूरे प्रशासनिक फेरबदल के बीच सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के एक ऐतिहासिक निर्णय के कानूनी पहलुओं का अध्ययन करना बेहद प्रासंगिक है। इस जजमेंट में वन्यजीव संरक्षण और अधिकारियों की जिम्मेदारियों को लेकर कई अहम टिप्पणियां की गई हैं:
*चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन की शक्तियां (पेज 35 व 38):** सुप्रीम कोर्ट ने वाइल्ड लाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1972 की धारा 33 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ही वह प्राधिकारी (Authority) है जो सभी अभ्यारण्यों (Sanctuaries) को नियंत्रित, प्रबंधित और संरक्षित करेगा। अधिनियम के तहत यह सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है कि वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवास में सुधार के लिए कड़े कदम उठाए जाएं।
पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन (पेज 129-130, पैरा 134):** फैसले के पैराग्राफ 134 में ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ (Public Trust Doctrine) का विस्तार से जिक्र किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जंगल, नदियां, हवा और प्राकृतिक संसाधन जनता की साझा संपत्ति हैं और राज्य सरकारें इनकी ट्रस्टी (Trustee) हैं।
इसलिए शक्तियों के हस्तांतरण पर ध्यान देने की बजाय प्राकृतिक संसाधनों के सरंक्षण पर ध्यान देने के बारे विचार किया जाता तो यह पर्यावरण व आम जनहित में होता।




