यमुनानगर/पंचकूला:
हरियाणा के खनन विभाग में फर्जीवाड़े का एक और बड़ा मामला सामने आया है। बेलगढ़ स्थित पंवार स्क्रीनिंग प्लांट द्वारा बिना खरीद के लाखों मीट्रिक टन खनिज सामग्री बेचे जाने के खुलासे ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कोई पहला मामला नहीं है; इसी साल चरखी दादरी, भिवानी, सोनीपत, पंचकूला और यमुनानगर के दर्जनों स्क्रीनिंग प्लांट पोर्टल के लूपहोल का फायदा उठाकर पौने आठ लाख मीट्रिक टन से अधिक अवैध खनिज सामग्री बेचने का पता चला था।
पोर्टल में लूपहोल या सोची-समझी मिलीभगत?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खनन पोर्टल पर परचेज (खरीद) दर्ज ही नहीं है, तो उससे अधिक सेल (बिक्री) के ‘ई-रवाना’ कैसे जनरेट हो गए?
  • अधिकारियों की चुप्पी: जिला खनन विभाग और पंचकूला आईटी सेल को इतने बड़े पैमाने पर हो रहे फर्जीवाड़े की तुरंत जानकारी क्यों नहीं मिली?
  • बार-बार लूपहोल का खुलना: सूत्रों के अनुसार, करीब 7 लाख मीट्रिक टन का गोलमाल पकड़ में आने के बाद पोर्टल की इस खामी को बंद कर दिया गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद यह ऑप्शन पोर्टल पर दोबारा चालू हो गया। इसी का नतीजा है कि बेलगढ़ में अकेले एक प्लांट से 1.41 लाख मीट्रिक टन बिना परचेज के माल बेच दिया गया।
क्या सिर्फ एफआईआर और जुर्माने तक सीमित रहेगी कार्रवाई?
बताया जाता है कि पिछली बार यमुनानगर के  जिन 10 से 11 यूनिट्स के नाम इस गड़बड़झाले में सामने आए थे, उनमें से अधिकतर ने जुर्माना भर दिया, क्या विभाग केवल जुर्माना वसूलने तक सीमित है।
बड़ा सवाल: क्या पोर्टल का इस तरह आपराधिक दुरुपयोग सिर्फ एक ‘कंपाउंडेबल ऑफेंस’ बनकर रह जाएगा?
प्रशासनिक स्तर पर ‘काली भेड़ों’ पर कब शिकंजा कसेंगे?
बिना मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर ई-रवाना जनरेट होना मुश्किल है। अवैध खनन और पोर्टल फर्जीवाड़े के इस कॉकस में केवल व्यापारी ही शामिल नहीं, बल्कि विभागीय स्तर पर बैठी ‘काली भेड़ें’ के बिना यह सब कुछ होना असंभव है। जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि इस बार भी क्या खानापूर्ति की कार्रवाई होगी या इस पूरे नेक्सस को संचालित करने वाले मुख्य चेहरों के नाम भी सामने आएंगे।
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