-धान के कबाड़ की बोली 10 लाख हुई कम, सचिव बोले कबाड़ कम निकला

छछरौली, यमुनानगर। छछरौली मार्केट कमेटी क्षेत्र में धान सीजन के दौरान कबाड़(फसल के अवशेषों) की बोली मात्र 6 लाख 11 हजार रुपये में हुई, जबकि पिछले वर्ष यही नीलामी 16 लाख रुपये में हुई थी। यानी सीधे 10 लाख रुपये की कमी, जबकि इस बार धान की आवक पिछले वर्ष के आस-पास या उससे ज्यादा बताई जा रही है। मंडी अधिकारियों का तर्क है कि इस बार धान से कबाड़ कम निकला, इसलिए नीलामी का रेट गिरा। लेकिन राइस मिलों की जांच में बड़े पैमाने पर करोड़ों रुपये के धान में कमी मिलने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि—क्या राईस मिलों में धान कम होने ओर मंडी कबाड़ के कम होने का कोई आपस का संबंध है? क्या मंडियों की आवक में आंकड़ों का खेल तो नहीं खेला गया।

मंडी में 21 लाख क्विंटल धान, पर कबाड़ पिछले साल से आधा भी नहीं

छछरौली मार्केट कमेटी में छछरौली अनाज मंडी, प्रतापनगर अनाज मंडी और खारवन खरीद केंद्र शामिल हैं। इन सभी में मिलाकर इस बार लगभग 21 लाख क्विंटल धान खरीदा गया है।इसके बावजूद कबाड़ की नीलामी का मूल्य 16 लाख से घटकर सिर्फ 6 लाख रह जाना सवाल उठाता है।

राइस मिलों की जांच ने बढ़ाई शंका

गौरतलब है कि राइस मिलों की जांच की शुरुआत भी इसी मार्केट कमेटी के अंतगर्त आने वाले प्रतापनगर क्षेत्र से हुई थी, जहाँ मिलों में कुटाई के लिए भेजा गया धान बड़े पैमाने पर कम पाया गया। अब उसी क्षेत्र की मंडियों कबाड़ की नीलामी भी अचानक 10 लाख रुपये कम में होने से सवाल खड़े हो रहे है।

कबाड़ कम होने का कारण—‘चैन कूप्पी मशीन’: मार्केट कमेटी सचिव

मार्केट कमेटी के सचिव रिषीराज यादव ने बताया कि इस बार किसानों ने धान निकालने में चैन कूप्पी मशीन का अधिक इस्तेमाल किया है, जिससे कबाड़ कम निकला।उनके अनुसार कई बार नीलामी कराने के बावजूद बोली नहीं बढ़ी, इसलिए यही टेंडर स्वीकृत किया गया। वहीं  जब उनसे पूछा गया कि क्या पिछली बार के टेंडर की संबधित ठेकेदार ने पेमेंट जमा करा दी है तो उन्होंने बताया कि अभी शायद एक से डेढ़ लाख बकाया है, वहीं इस बार की पूरी पेमेंट जमा हो गई है। यानी पिछली बार का टेंडर हो गया, माल उठ गया, पेमेंट अभी तक मार्किट कमेटी के पास नहीं पहुंची है।

फिर भी सवाल कायम—क्या नई तकनीक इतनी प्रभावी थी या मामला कहीं और है?

जानकारों का मानना है कि खेतों में धान निकालने की तकनीक में पिछले वर्ष की तुलना में इतना बड़ा बदलाव नहीं हुआ है कि एकदम साफ धान मंडी में पहुंच जाए। क्या मंडियों में वाकई उतना धान आया, जितना आंकड़ों में दिखाया गया है या फिर राइस मिलों में कम मिले धान और मंडियों में कम कबाड़—दोनों एक ही बड़े खेल की ओर इशारा कर रहे हैं?

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