कलेसर (यमुनानगर): हरियाणा के अंतिम छोर पर स्थित कलेसर नेशनल पार्क के पास से गुजरने वाली यमुना नदी के ‘बेली’ इलाके में खैर के पेड़ों का वजूद खतरे में है। जिस जंगल को अपनी सघनता के लिए जाना जाता था, वह अब वन माफिया की भेंट चढ़ चुका है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह अवैध कटान कलेसर रेंज फॉरेस्ट ऑफिस की नाक के नीचे, मात्र कुछ सौ मीटर की दूरी पर हुआ है।

मौके के हालात: साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश

जमीन पर मौजूद हालात बयां कर रहे हैं कि कटान हाल ही में और योजनाबद्ध तरीके से किया गया है। बेली क्षेत्र में प्रवेश करते ही जंगल के दृश्य बदल जाते हैं:

  • ताजे कटान के निशान: जंगल के भीतर बड़ी संख्या में खैर के पेड़ों की मुंडियां (ठूंठ) बिखरी पड़ी हैं। कुछ मुंडियां बिल्कुल ताजी हैं, जिनके पास अभी भी कटी हुई मोटी टहनियां मौजूद हैं।

  • मिटाए जा रहे सबूत: कई जगहों पर पेड़ों के ठूंठों को आग के हवाले कर दिया गया है ताकि उनकी गिनती न हो सके। इतना ही नहीं, मुख्य रास्ते से दक्षिण की ओर जाने पर कई जगह गड्ढे और ताजी मिट्टी मिली है, जिससे प्रतीत होता है कि जेसीबी या अन्य औजारों से मुंडियों को जड़ समेत उखाड़कर सबूतों को दफन कर दिया गया है।

प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा पर सवाल

सुरक्षा के दावों की पोल:  पंचायत प्रतिनिधि के अनुसार इस एरिया के लिए वन विभाग ने 2 से 3 विशेष रखवाले (चौकीदार) तैनात किए हैं। सवाल यह है कि उनकी मौजूदगी में इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और ढुलाई कैसे हो गई? रेंज कार्यालय से चंद कदमों की दूरी पर कुल्हाड़ी और आरे की गूंज अफसरों के कानों तक न पहुंचना बड़े सवाल खड़े करती है।

जिम्मेदारी का ‘पासिंग द पार्सल’ खेल

जमीन के मालिकाना हक और सुरक्षा को लेकर स्थिति कुछ इस प्रकार है:

  • पंचायत का पक्ष: कलेसर के सरपंच प्रतिनिधि ज्ञान सिंह ने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह बेली पंचायत की भूमि है, लेकिन यहाँ वृक्षारोपण (Plantation) से लेकर सुरक्षा तक का सारा जिम्मा वन विभाग का है।

  • कार्रवाई का आश्वासन: सरपंच प्रतिनिधि ने कहा कि वे अपने स्तर पर चौकीदार भेजकर जांच कराएंगे और मामले की रिपोर्ट बीडीपीओ (BDPO) कार्यालय को सौंपेंगे।

आर्थिक और पर्यावरणीय क्षति

खैर की लकड़ी का उपयोग कत्था बनाने के लिए किया जाता है, जिसकी बाजार में भारी कीमत है। माफिया की नजर यहाँ के पुराने और मोटे पेड़ों पर थी। अब इस जंगल में केवल पतले और गिनती के पेड़ ही शेष रह गए हैं। यदि जल्द ही ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यमुना किनारे का यह बेल्ट पूरी तरह बंजर हो जाएगी।


आगे क्या? मामला अब PCCF (प्रधान मुख्य वन संरक्षक) कार्यालय, पंचकूला के संज्ञान में है। अब यह देखना बाकी है कि इस पर कार्रवाई होती है या नहीं।

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